मुक्तक

ग़म

पत्थर से  शीशा बन जाना सब के बस की बात नहीं 
सीने में ग़म को दफ़नाना सब के बस की बात नहीं 
ग़ैरों के  रिसते  ज़ख़्मों  पर  कोई भी हँस लेता है
अपने ज़ख़्मों पर मुस्काना सब के बस की बात नहीं।

पहचान

अधरों की  मुस्कान   बना मैं
ख़ुश्बू  की   पहचान बना मैं
किशना की मुरली में ढ़लकर
सूर बना   रसखान  बना मैं। 
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पैमाने

ठहरे हुये  कितने  ही  पैमाने  मिले
गुज़रे  हुये कितने ही अफ़साने मिले
आँखें नहीं गहरी है  कोई  झील ये
डूबे हुये  कितने  ही  दीवाने मिले। 

परी

प्रीत की  एक नदी  लगती हो
एक  लम्हा की सदी लगती है
ढाने वाली हो कयामत तुम तो
आसमानी सी  परी लगती हो। 

मिलन

मुहब्बत को   दिल में  बसाये  तू रखना
सदा  शम्अ-ए-उल्फ़त  जलाये तू रखना
मिलन  दो  दिलों  का  न आसान होगा 
मगर दिल  से दिल को लगाए तू रखना। 

इश्क़

इश्क़  को तुम  इल्ज़ाम न दो
यूँ   आँसू    इन्आम  न दो
भूल   गया  हूँ ख़ुद   को मैं 
अब  मुझको  तुम नाम न दो

निरक्षरता

निरक्षरता एक ऐसा अभिशाप है जिसे सिर्फ अक्षरों के स्पर्श से मुक्त किया जा सकता है।

साँप

साँप को तब मारना चाहिए जब वो अपना फन उठाये।

ज़िंदगी

ज़िंदगी एक पहेली तो होती है लेकिन सुलझ जाये तो ज़िंदगी , ज़िंदगी न रहे ।

पानी

पानी एक पहेली तो होती है लेकिन सुलझ जाये तो पानी , पानी न रहे ।

मौत

मौत ज़िंदगी की मंज़िल नहीं सिर्फ एक पड़ाव है।

नदी

नदियों की यात्रा अक्सर समुन्दर में ख़त्म होती है लेकिन कुछ नदियाँ रास्ते में ही सूख जाती हैं।