कविता
पहचान
हर गाँव की पगडण्डी किसी न किसी बड़े शहर में निकलती है और हर बड़े शहर की काली सड़कें कहीं न कहीं जुड़ती हैं उन अनजाने जंगलों से , जहाँ से लौट कर जो भी आता है अपनी पहचान खो ही आता है।
हर गाँव की पगडण्डी किसी न किसी बड़े शहर में निकलती है और हर बड़े शहर की काली सड़कें कहीं न कहीं जुड़ती हैं उन अनजाने जंगलों से , जहाँ से लौट कर जो भी आता है अपनी पहचान खो ही आता है।