ग़ज़ल
इस बज़ाहिर तीरगी से दोस्त घबराना नहीं
हम फ़क़ीरी में दिल लुटाने को ग़म की दौलत चले कमाने को करता है इश्क़ वो सताने को हम भी दिल रखते हैं लुभाने को संगबारी है और हम तन्हा क्या ख़बर हो गयी ज़माने को झील ने आँख मूँद ली है अभी चाँद निकलेगा क्या नहाने को बुझते शोलों को तुम हवा ना दो राख काफी है दिल जलाने को बेसबब दिल में आ के वो बैठा उम्र गुज़री जिसे भुलाने को फूल सूखे हुए ही चंद आँसू बस यही रह गए बिछाने को रंग पर आ गयी ' रसिक ' महफ़िल हम जो आये ग़ज़ल सुनाने को