गीत

ज़िक्र ही करे न जो

 ज़िक्र ही करे ने जो , गीत ही वो क्या  



दिल की पुकार का, मुफ़लिस के प्यार का 

टूटे हुए    साज़ का ,   डूबती आवाज़ का 



ज़िक्र ही करे ने जो , गीत ही वो क्या 



पंछी की प्यास का , बादल की आस का 

बीते हुए काल का , आने वाले साल का 



ज़िक्र ही करे ने जो , गीत ही वो क्या 



लाजो की लाज का , जलते हुए आज का 

टूटे   हुए काँच का , बढ़ती हुई आँच  का 



ज़िक्र ही करे ने जो , गीत ही वो क्या 



ग़ैरों के  घाव का ,  डूबती  इस  नाव का 

टूटे हुए भाग का , तन -बदन की आग का 



ज़िक्र ही करे ने जो , गीत ही वो क्या 

कवि- इन्दुकांत आंगिरस ©