ग़ज़ल

फिर दिल से उठी लपटें घर को न जला लेना

फिर दिल से उठी लपटें घर को न जला लेना 

बेहतर है यही इन को दिल ही में दबा लेना 



जब भी तू कभी चाहे जब दिल में तेरे आए

इस पार बुला लेना , उस पार बुला लेना 



है तेरे सिवा    किसका अंदाज़े बयां ऐसा 

इक बात बता देना , इक बात छुपा लेना 



मुमकिन है कि फिर तुझको वो शख़्स न मिल पाए 

बढ़ के तू     गले    उस को इक    बार लगा लेना 



मुमकिन तो नहीं यारो , मुश्किल भी नहीं लेकिन 

सीने पे  हवाओं के , इक  दीप जला देना 



इस दौर    के लोगो ने    सीखा   है हुनर कैसा 

ख़ुद अपनी ही लाशों पे इक दुनिया बसा लेना 



बुझती है अगर शम्मा बुझने दे ' रसिक  ' उसको 

इन ग़म के अंधेरों से इस दिल को जला लेना